एक मेरे मित्तर थिए जी

एक मेरे मित्तर थिए जी... बड्डे भाई की तरे माणता थिए जी उनको... द्रसल मेरी गाँव में बंजर जमीन थी जी.... मित्तर जी उठते बैठते म्हारे साथ थिए... खाते पीते भी कट्ठा... एक दिन म्हारे में समझोता होया जी... कि इस बंजर जीमी (जमीन ) पर कुछ उगाया जाए... वो भी मदद करेंगे..... लेकण पाणी-खाद, सलाह मशविरा वो मेरे से लेते थिए... कने मैं उनसे लेता थिया... कने जमीन पर फल-फ्रूट लगणा शुरू होया.... फिर क्या था तिसते परांत जिमी जीयां-जीयां लगी सूना उगलणे... मेरी जमीन पर लगे फल-फ्रूट खा गए मित्तर जी.... कने मेरी जमीन पर आपणा प्लॉट बणा लिया मित्तर जी ने...... कायदे कानून कुछ होएंगे जी कि नीं.....? मित्तर जी ने जो किया अच्छा था कि नकाम्मा... आप बी बोलो... कोरट कचहरी जाणे से फैदा होएगा कोई....??

लो जी ओ सोच रए थिए कि

लो जी ओ सोच रए थिए कि आपके रगड़ा सिंग खडपंच सुरग में चले गए... एड़ा नीं हो सकता जी... जब तक लखारियों की दुनियाँ के खुराफातिए जीउंदे हैं... तब तक आप का ए खडपंच कैसे मर सकता है..... हम तो इदर ही है जी.... क्या आप बी है म्हारे साथ.....? तो आओ फिर खश्टोरों का खात्मा करें...चरनाबंदे....